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हंसगीता • अध्याय 1 • श्लोक 6
सात्त्विकान्येव सेवेत पुमान्सत्त्वविवृद्धये । ततो धर्मस्ततो ज्ञानं यावत्स्मृतिरपोहनम् ॥
जब तक अपने आत्मा का साक्षात्कार तथा स्थूल-सूक्ष्म शरीर और उनके कारण तीनों गुणों की निवृत्ति न हो, तब तक मनुष्य को चाहिये कि सत्त्वगुण की वृद्धि के लिये सात्त्विक शास्त्र आदि का ही सेवन करे; क्योंकि उससे धर्म की वृद्धि होती है और धर्म की वृद्धि से अन्तःकरण शुद्ध होकर आत्मतत्त्व का ज्ञान होता है।
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