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हंसगीता • अध्याय 1 • श्लोक 5
तत्तत्सात्त्विकमेवैषां यद्यद्वृद्धाः प्रचक्षते । निन्दन्ति तामसं तत्तद्राजसं तदुपेक्षितम् ॥
इनमें से शास्त्रज्ञ महात्मा जिनकी प्रशंसा करते हैं, वे सात्त्विक हैं, जिनकी निंदा करते हैं, वे तामसिक हैं और जिनकी उपेक्षा करते हैं, वे वस्तुएँ राजसिक हैं।
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