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हंसगीता • अध्याय 1 • श्लोक 38
मयैतदुक्तं वो विप्रा गुह्यं यत्साङ्ख्ययोगयोः । जानीत माऽऽगतं यज्ञं युष्मद्धर्मविवक्षया ॥
सनकादि ऋषियो! मैंने तुमसे जो कुछ कहा है, वह सांख्य और योग दोनों का गोपनीय रहस्य है। मैं स्वयं भगवान्‌ हूँ, तुम लोगों को तत्त्वज्ञान का उपदेश करने के लिये ही यहाँ आया हूँ, ऐसा समझो।
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