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हंसगीता • अध्याय 1 • श्लोक 37
देहोऽपि दैववशगः खलु कर्म यावत् स्वारम्भकं प्रतिसमीक्षत एव सासुः । तं सप्रपञ्चमधिरूढसमाधियोगः स्वाप्नं पुनर्न भजते प्रतिबुद्धवस्तुः ॥
प्राण और इन्द्रियों के साथ यह शरीर भी प्रारब्ध के अधीन है। इसलिये अपने आरम्भक (बनाने वाले) कर्म जब तक हैं, तब तक उनकी प्रतीक्षा करता ही रहता है। परन्तु आत्मवस्तु का साक्षात्कार करने वाला तथा समाधिपर्यन्त योग में आरूढ़ पुरुष स्त्री, पुत्र, धन आदि प्रपंच के सहित उस शरीर को फिर कभी स्वीकार नहीं करता, अपना नहीं मानता जैसे जगा हुआ पुरुष स्वप्नावस्था के शरीर आदि को।
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