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हंसगीता • अध्याय 1 • श्लोक 35
दृष्टिं ततः प्रतिनिवर्त्य निवृत्ततृष्ण- स्तूष्णीं भवेन्निजसुखानुभवो निरीहः । सन्दृश्यते क्व च यदीदमवस्तुबुद्ध्या त्यक्तं भ्रमाय न भवेत्स्मृतिरानिपातात् ॥
इसलिये उस देहादिरूप दृश्य से दृष्टि हटाकर तृष्णारहित इन्द्रियों के व्यापार से हीन और निरीह होकर आत्मानन्द के अनुभव में मग्न हो जाय। यद्यपि कभी-कभी आहार आदि के समय यह देहादिक प्रपंच देखने में आता है, तथापि यह पहले ही आत्मवस्तु से अतिरिक्त और मिथ्या समझकर छोड़ा जा चुका है। इसलिये वह पुनः भ्रान्तिमूलक मोह उत्पन्न करने में समर्थ नहीं हो सकता । देहपातपर्यन्त केवल संस्कारमात्र उसकी प्रतीति होती है।
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