यो जागरे बहिरनुक्षणधर्मिणोऽर्थान्
भुङ्क्ते समस्तकरणैर्हृदि तत्सदृक्षान् ।
स्वप्ने सुषुप्त उपसंहरते स एकः
स्मृत्यन्वयात्त्रिगुणवृत्तिदृगिन्द्रियेशः ॥
जो जाग्रतू-अवस्था में समस्त इन्द्रियों के द्वारा बाहर दीखने वाले सम्पूर्ण क्षणभंगुर पदार्थो का अनुभव करता है और स्वप्नावस्था में हृदय में ही जाग्रत में देखे हुए पदार्थो के समान ही वासनामय विषयों का अनुभव करता है तथा सुषुप्ति-अवस्था में उन सब विषयों को समेटकर उनके लय का भी अनुभव करता है, वह एक ही है। जाग्रत्-अवस्था के इन्द्रिय, स्वप्नावस्था के मन और सुषुप्ति की संस्कारवती बुद्धि का भी वही स्वामी है; क्योंकि वह त्रिगुणमयी तीनों अवस्थाओं का साक्षी है। 'जिस मैंने स्वप्न देखा, जो मैं सोया, वही मैं जाग रहा हूँ' - इस स्मृति के बल पर एक ही आत्मा का समस्त अवस्थाओं में होना सिद्ध हो जाता है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
हंसगीता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।