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हंसगीता • अध्याय 1 • श्लोक 31
असत्त्वादात्मनोऽन्येषां भावानां तत्कृता भिदा । गतयो हेतवश्चास्य मृषा स्वप्नदृशो यथा ॥
आत्मा से अन्य देह आदि प्रतीयमान नामरूपात्मक प्रपंच का कुछ भी अस्तित्व नहीं है। इसलिये उनके कारण होने वाले वर्णाश्रमादिभेद, स्वर्गादफिल और उनके कारणभूत कर्म - ये सब-के-सब इस आत्मा के लिये वैसे ही मिथ्या हैं; जैसे स्वपणदर्शी पुरुष के द्वारा देखे हुए सबके-सब पदार्थ।
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