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हंसगीता • अध्याय 1 • श्लोक 30
यावन्नानार्थधीः पुंसो न निवर्तेत युक्तिभिः । जागर्त्यपि स्वपन्नज्ञः स्वप्ने जागरणं यथा ॥
जब तक पुरुष की भिन्‍न-भिनन पदार्थो में सत्यत्वबुद्धि, अहंबुद्धि और ममबुद्धि युक्तियों के द्वारा निवृत्त नहीं हो जाती, तब तक वह अज्ञानी यद्यपि जागता है तथापि सोता हुआ-सा रहता है - जैसे स्वप्नावस्था में जान पड़ता है कि मैं जाग रहा हूँ।
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