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हंसगीता • अध्याय 1 • श्लोक 3
धर्मो रजस्तमो हन्यात्सत्त्ववृद्धिरनुत्तमः । आशु नश्यति तन्मूलो ह्यधर्म उभये हते ॥
जिस धर्म के पालन से सत्त्वगुण की वृद्धि हो, वही सबसे श्रेष्ठ है। वह धर्म रजोगुण और तमोगुण को नष्ट कर देता है। जब वे दोनों नष्ट हो जाते हैं, तब उन्हीं के कारण होने वाला अधर्म भी शीघ्र ही मिट जाता है।
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