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हंसगीता • अध्याय 1 • श्लोक 29
अहङ्कारकृतं बन्धमात्मनोऽर्थविपर्ययम् । विद्वान्निर्विद्य संसारचिन्तां तुर्ये स्थितस्त्यजेत् ॥
यह बन्धन अहंकार की ही रचना है और यही आत्मा के परिपूर्णतम सत्य, अखण्डज्ञान और परमानन्दस्वरूप को छिपा देता है। इस बात को जानकर विरक्त हो जाय और अपने तीन अवस्थाओं में अनुगत तुरीयस्वरूप में होकर संसार की चिन्ता को छोड़ दे।
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