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हंसगीता • अध्याय 1 • श्लोक 28
यर्हि संसृतिबन्धोऽयमात्मनो गुणवृत्तिदः । मयि तुर्ये स्थितो जह्यात्त्यागस्तद्गुणचेतसाम् ॥
क्योंकि बुद्धि-वृत्तियों के द्वारा होने वाला यह बन्धन ही आत्मा में त्रिगुणमयी वृत्तियों का दान करता है। इसलिये तीनों अवस्थाओं से विलक्षण और उनमें अनुगत मुझ तुरीय तत्त्व में स्थित होकर इस बुद्धि के बन्धन का परित्याग कर दे। तब विषय और चित्त दोनों का युगपत त्याग हो जाता है।
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