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हंसगीता • अध्याय 1 • श्लोक 25
गुणेष्वाविशते चेतो गुणाश्चेतसि च प्रजाः । जीवस्य देह उभयं गुणाश्चेतो मदात्मनः ॥
पुत्रों! यह चित्त चिन्तन करते-करते विषयाकार हो जाता है और विषय चित्त में प्रविष्ट हो जाते हैं, यह बात सत्य है, तथापि विषय और चित्त ये दोनों ही मेरे स्वरूपभूत जीव के देह हैं - उपाधि हैं अर्थात्‌ आत्मा का चित्त और विषय के साथ कोई सम्बन्ध ही नहीं है।
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