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हंसगीता • अध्याय 1 • श्लोक 24
मनसा वचसा दृष्ट्या गृह्यतेऽन्यैरपीन्द्रियैः । अहमेव न मत्तोऽन्यदिति बुध्यध्वमञ्जसा ॥
मन से, वाणी से, दृष्टि से तथा अन्य इन्द्रियों से भी जो कुछ ग्रहण किया जाता है, वह सब मैं ही हूँ, मुझसे भिन्‍न और कुछ नहीं है। यह सिद्धान्त आप लोग तत्त्वविचार के द्वारा समझ लीजिये।
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