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हंसगीता • अध्याय 1 • श्लोक 23
पञ्चात्मकेषु भूतेषु समानेषु च वस्तुतः । को भवानिति वः प्रश्नो वाचारम्भो ह्यनर्थकः ॥
देवता, मनुष्य, पशु, पक्षी आदि सभी शरीर पज्चभूतात्मक होने के कारण अभिन्न ही हैं और परमार्थरूप से भी अभिन्न हैं। ऐसी स्थिति में 'आप कौन हैं?' आप लोगों का यह प्रश्न ही केवल वाणी का व्यवहार है। विचारपूर्वक नहीं है, अतः निरर्थक है।
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