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हंसगीता • अध्याय 1 • श्लोक 17
सनकादय ऊचुः । गुणेष्वाविशते चेतो गुणाश्चेतसि च प्रभो । कथमन्योन्यसन्त्यागो मुमुक्षोरतितितीर्षोः ॥
सनकादि परमर्षियों ने पूछा - पिताजी! चित्त गुणों अर्थात्‌ विषयों में घुसा ही रहता है और गुण भी चित्त की एक-एक वृत्ति में प्रविष्ट रहते ही हैं अर्थात्‌ चित्त और गुण आपस में मिले-जुले ही रहते हैं। ऐसी स्थितिमें जो पुरुष इस संसारसागर से पार होकर मुक्तिपद प्राप्त करना चाहता है, वह इन दोनों को एक-दूसरे से अलग कैसे कर सकता है?
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