प्रिय उद्धव! मेरे शिष्य सनकादि परमर्षियों ने योग का यही स्वरूप बताया है कि साधक अपने मन को सब ओर से खींचकर विराट आदि में नहीं, साक्षात् मुझमें ही पूर्णरूप से लगा दें।
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