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हंसगीता • अध्याय 1 • श्लोक 14
एतावान्योग आदिष्टो मच्छिष्यैः सनकादिभिः । सर्वतो मन आकृष्य मय्यद्धावेश्यते यथा ॥
प्रिय उद्धव! मेरे शिष्य सनकादि परमर्षियों ने योग का यही स्वरूप बताया है कि साधक अपने मन को सब ओर से खींचकर विराट आदि में नहीं, साक्षात्‌ मुझमें ही पूर्णरूप से लगा दें।
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