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हंसगीता • अध्याय 1 • श्लोक 13
अप्रमत्तोऽनुयुञ्जीत मनो मय्यर्पयञ्छनैः । अनिर्विण्णो यथाकालं जितश्वासो जितासनः ॥
साधक को चाहिये कि आसन और प्राणवायु पर विजय प्राप्त कर अपनी शक्ति और समय के अनुसार बड़ी सावधानी से धीरे-धीरे मुझमें अपना मन लगाये और इस प्रकार अभ्यास करते समय अपनी असफलता देखकर तनिक भी ऊबे नहीं, बल्कि और भी उत्साह से उसी में जुड़ जाय।
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