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हंसगीता • अध्याय 1 • श्लोक 11
करोति कामवशगः कर्माण्यविजितेन्द्रियः । दुःखोदर्काणि सम्पश्यन् रजोवेगविमोहितः ॥
अब वह अज्ञानी कामवश अनेकों प्रकार के कर्म करने लगता है और इन्द्रियों के वश होकर, यह जानकर भी कि इन कर्मों का अन्तिम फल दुःख ही है, उन्हीं को करता है, उस समय वह रजोगुण के तीव्र वेग से अत्यन्त मोहित रहता है।
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