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हंसगीता • अध्याय 1 • श्लोक 10
रजोयुक्तस्य मनसः सङ्कल्पः सविकल्पकः । ततः कामो गुणध्यानाद्दुःसहः स्याद्धि दुर्मतेः ॥
बस, जहाँ मन में रजोगुण की प्रधानता हुई कि उसमें संकल्पविकल्पों का ताँता बँध जाता है। अब वह विषयों का चिन्तन करने लगता है और अपनी दुर्बुद्धि के कारण काम के फंदे में फँस जाता है, जिससे फिर छुटकारा होना बहुत ही कठिन है।
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