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गरुड़ • अध्याय 1 • श्लोक 5
स्वस्तिको दक्षिणं पादं वामपादं तु कुञ्चितम् । प्राञ्जलीकृतदोर्युग्मं गरुडं हरिवल्लभम्। अनन्तो वामकटको यज्ञसूत्रं तु वासुकिः। तक्षकः कटिसूत्रं तु हारः कर्कोट उच्यते । पद्मो दक्षिणकर्णे तु महापद्मस्तु वामके। शङ्खः शिरःप्रदेशे तु गुलिकस्तु भुजान्तरे। पौण्ड्रकालिकनागाभ्यां चामराभ्यां सुवीजितम्। एलापुत्रकनागाद्यैः सेव्यमानं मुदान्वितम्। कपिलाक्षं गरुत्मन्तं सुवर्णसदृशप्रभम्। दीर्घबाहुं बृहत्स्कन्धं नागाभरणभूषितम्। आजानुतः सुवर्णाभमाकट्योस्तुहिनप्रभम्। कुङ्कुमारुणमाकण्ठं शतचन्द्रनिभाननम्। नीलाग्रनासिकावक्त्रं सुमहच्चारुकुण्डलम्। दंष्ट्राकरालवदनं किरीटमुकुटोज्ज्वलम्। कुङ्कुमारुणसर्वाङ्ग कुन्देन्दु-धवलाननम् । विष्णुवाह नमस्तुभ्यं क्षेमं कुरु सदा मम । एवं ध्यायेत्त्रिसंध्यासु गरुडं नागभूषणम्। विषं नाशयते शीघ्रं तूलराशिमिवानलः ।।
ध्यान - जिनका दाहिना पैर स्वस्तिक के आकार के सदृश है, बायाँ पैर घुटने तक सिकोड़ कर रखा है। जिन्होंने दोनों हाथों को प्रणाम की मुद्रा में जोड़ रखा है, जो विष्णुवल्लभ हैं। जिन्होंने अनन्त नामक नाग को बायें हाथ में कड़े के रूप में धारण कर रखा हैं। यज्ञोपवीत के रूप में वासुकि को धारण किया है। तक्षक को करधनी के रूप में और कर्कोट को गले में हार के सदृश धारण किया है। पद्म नामक नाग को दाहिने कान में और महापद्म को बायें कान में आभूषण की भाँति धारण कर रखा है। शंख नामक नाग को सिर पर एवं गुलिक (नाग) को भुजाओं के मध्य में धारण कर रखा है। पौण्ड्र एवं कालिक नागों को चँवरों के रूप में प्रयुक्त किया गया है। एला तथा पुत्रक आदि नागों के द्वारा प्रसन्नतापूर्वक जिनकी सेवा की जाती हैं। कपिल वर्ण सदृश नेत्र सुवर्ण के समान कान्ति वाले, लम्बी भुजाओं वाले, चौड़े (विशाल) कन्धे वाले, नागों के अलंकारों से विभूषित, शानु पर्यन्त सुवर्ण के समान कान्ति वाले तथा कटि पर्यन्त हिम के समान श्वेत प्रभा वाले, कुंकुम के समान लाल शरीर वाले, सैकड़ों चन्द्रमाओं के समान मुख-कान्ति बाले, जिनकी नासिका का अग्रभाग तथा मुख मण्डल नील वर्ण का है। विशाल कुण्डलों से युक्त जिनके कान हैं। भयंकर दाढ़ों से युक्त विकराल मुख वाले, अत्यन्त देदीप्यमान मुकुट धारण करने वाले, कुंकुम लगाने से लाल अंग वाले, कुन्द पुष्प एवं चन्द्र के सदृश धवल मुख वाले, हे विष्णु के वाहन गरुड़देव! आपको नमस्कार है। आप सदैव हमारा कल्याण करें। इस प्रकार तीनों संध्याओं में नागों से अलंकृत गरुड़ का ध्यान करना चाहिए। (इससे प्रसन्न होकर वे गरुड़देव) राई के ढेर को, अग्नि के द्वारा दग्ध करने के सदृश विष को शीघ्र ही विनष्ट कर देते हैं।
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