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गरुड़ • अध्याय 1 • श्लोक 3
ॐ नमो भगवते अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । श्रीमहागरुडाय तर्जनीभ्यां स्वाहा। पक्षीन्द्राय मध्यमाभ्यां वषट्। श्रीविष्णुवल्लभाय अनामिकाभ्यां हुम्। त्रैलोक्यपरिपूजिताय कनिष्ठिकाभ्यां वौषट् । उग्रभयंकरकालानलरूपाय करतलकरपृष्ठाभ्यां फट्। एवं हृदयादिन्यासः ॥
ॐ नमो अङ्गुष्ठाभ्यां नमः । (दोनों हाथों की तर्जनी अंगुलियों से दोनों अंगूठों का स्पर्श) श्री महागरुडाय तर्जनीभ्यां स्वाहा। (दोनों हाथों के अँगूठों से दोनों तर्जनी अङ्गुलियों का स्पर्श) पक्षीन्द्राय मध्यमाभ्यां वषट्। (अँगूठों से मध्यमा अँगुलियों का स्पर्श) श्री विष्णुवल्लभाय अनामिकाभ्यां हुम्। (अँगूठों से अनामिका अँगुलियों का स्पर्श) त्रैलोक्यपरिपूजिताय कनिष्ठिकाभ्यां वौषट्। (अँगूठों से कनिष्ठिका अँगुलियों का स्पर्श) उग्रभयंकर करतलकरपृष्ठाभ्यां फट्। (हथेलियों और उनके पृष्ठ भागों का परस्पर स्पर्श) इसी तरह से दाहिने हाथ की पाँचों अँगुलियों से हृदयादि (शिर, शिखा, कवच, नेत्रादि) का भी न्यास (स्पर्श) करना चाहिए।
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