मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
गरुड़ • अध्याय 1 • श्लोक 25
य इमां ब्रह्मविद्याममावास्यायां पठेच्छृणुयाद्वा यावज्जीवं न हिंसन्ति सर्पाः । अष्टौ ब्राह्मणान्ग्राहयित्वा तृणेन मोचयेत्। शतं ब्राह्मणान् ग्राहयित्वा चक्षुषा मोचयेत् । सहस्त्रं ब्राह्मणान् ग्राहयित्वा मनसा मोचयेत्। सर्पाञ्जलेन मुञ्चन्ति। तृणेन मुञ्चन्ति। काष्ठेन मुञ्चन्तीत्याह भगवा-न्ब्रह्मेत्युपनिषत् ॥
जो साधक (मनुष्य) इस ब्रह्मविद्या का अमावस्या के दिन पाठ करता या श्रवण करता है, उसका जब तक जीवन रहता है, तब तक उसे सर्प (आदि विषैले जन्तु) नहीं काटते। (इस ब्रह्मविद्या को) आठ प्राणों को ग्रहण (स्वीकार) करवाकर तृण (जड़ी-बूटी) के द्वारा विष को मुक्त करना चाहिए। सौ ब्राह्मणों को (इसे) ग्रहण करवा करके नेत्रों से (विष को) मुक्त करना चाहिए। हजार ब्राह्मणों को (इसे) ग्रहण करवाकर मन से (अर्थात् संकल्प शक्ति से) ही (विष को) मुक्त करना चाहिए। सर्प-विष, जल, तृण एवं काष्ठ के उपचार से भी छोड़ता नहीं है। (इस प्रयोग से मुक्त कर देता है। ऐसा ही भगवान् ब्रह्मा जी ने इस गरुडोपनिषद् को ऋषियों के समक्ष उपदिष्ट किया है। यही उपनिषद् है।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
गरुड़ के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

गरुड़ के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें