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गरुड़ • अध्याय 1 • श्लोक 10
ॐ नमो भगवते महागरुडाय विष्णुवाहनाय त्रैलोक्यपरिपूजिताय वज्रनखवज्रतुण्डाय वज्रपक्षालंकृतशरीराय एह्येहि महागरुड विषं छिन्धि छिन्धि आवेशयावेशय हुं फट् स्वाहा ।।
(उन) भगवान् महागरुड़ को नमस्कार है। भगवान् विष्णु के वाहन तीनों लोकों में पूजित, वज्रवत् कठोर नाखून एवं कठोर चोंच वाले तथा अपने शरीर को कठोर पंखों से अलंकृत करने वाले हे गरुड़देव! आप आए आप पधारें। हे महागरुड़! आप आविष्ट (प्रविष्ट) हो करके विष को छिन्न-भिन्न कर दें। 'हुं फट्' (बीज मन्त्र के सहित गरुड़देव के प्रसन्नतार्थ) आहुति समर्पित है।
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