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गणेशगीता • अध्याय 9 • श्लोक 4
खगणं स्ववशं कृत्वाखिलभूतहितार्थकृत् । ध्येयमक्षरमव्यक्तं सर्वगं कूटगं स्थिरम् ॥
सम्पूर्ण इन्द्रियों को अपने वश में करके सब प्राणियों का हित करता हुआ जो अक्षर, अव्यक्त, सर्वव्यापी और कूटस्थ स्थिर
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