सर्वेन्द्रियाण्यधिष्ठाय जाठरं च धनंजयम् ।
भुनज्मि चाखिलान्भोगान्पुण्यपापविवर्जितः ॥
सम्पूर्ण इन्द्रियों में तथा उदर में स्थित होकर धनंजय नामक प्राण और जठराग्निरूप से पाप-पुण्यरहित होकर मैं ही सम्पूर्ण भोगों को भोगता हूँ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
गणेशगीता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
गणेशगीता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।