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गणेशगीता • अध्याय 9 • श्लोक 38
सर्वेन्द्रियाण्यधिष्ठाय जाठरं च धनंजयम् । भुनज्मि चाखिलान्भोगान्पुण्यपापविवर्जितः ॥
सम्पूर्ण इन्द्रियों में तथा उदर में स्थित होकर धनंजय नामक प्राण और जठराग्निरूप से पाप-पुण्यरहित होकर मैं ही सम्पूर्ण भोगों को भोगता हूँ।
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