श्रीगजानन उवाच-
यो मां मूर्तिधरं भक्त्या मद्भक्तः परिसेवते ।
स मे मान्योऽनन्यभक्तिर्नियुज्य हृदयं मयि ॥
श्रीगणेशजी बोले - जो भक्त मूर्तिमान् मेरी भक्तिपूर्वक उपासना करता है, वह हृदय में मुझे धारण करने वाला अनन्य भक्तिमान् मुझे (विशेष) मान्य है।
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