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गणेशगीता • अध्याय 9 • श्लोक 28
विश्वभृच्चाखिलव्यापि त्वेकं नानेव भासते । बाह्याभ्यन्तरतः पूर्णमसंगं तमसः परम् ॥
विश्व को धारण करने वाला, सर्वत्र व्यापक, एक होकर अनेक रूप से भासता है, वह बाहर भीतर से पूर्ण, असंग और अन्धकार से परे है।
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