रिपौ मित्रेऽथ गर्हायां स्तुतौ शोके समः समुत् ।
मौनी निश्चलधीभक्तिरसंगः स च मे प्रियः ॥
शत्रु-मित्र, निन्दा-स्तुति, हर्ष-शोक में जिसका चित्त एक है, जो मौनी, स्थिरचित्त, भक्तिमान् और असंग है, वह मेरा प्रिय है।
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