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गणेशगीता • अध्याय 9 • श्लोक 15
निरहंममताबुद्धिरद्वेषः शरणः समः । लाभालाभे सुखे दुःखे मानामाने स मे प्रियः ॥
जो अहंकार का त्याग करने वाला, ममता बुद्धि से रहित, द्वेष न करने वाला, सब में करुणा रखने वाला और लाभ-अलाभ, सुख-दुःख, मान-अपमान में एक दृष्टि रखने वाला है, वह मेरा प्रिय है।
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