प्रभवं मे विभूतिश्च न देवा ऋषयो विदुः ।
नानाविभूतिभिरहं व्याप्य विश्वं प्रतिष्ठितः ॥
इति श्रीगणेशपुराणे गजाननवरेण्यसंवादे गणेशगोवायां उपासनायोगो नाम सप्तमोऽध्यायः ॥
मेरे प्रभव (उत्पत्ति) और मेरी विभूतियों को देवता और ऋषि भी नहीं जानते। मैं अनेक विभूतियों से विश्व में व्याप्त होकर स्थित हूँ। जो-जो इस लोक में श्रेष्ठतम हैं, वे सब मेरी विभूति हैं - ऐसा समझो।
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