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गणेशगीता • अध्याय 7 • श्लोक 18
य उपासनया हीनो धिङ्नरो व्यर्थजन्मभाक् । यज्ञोऽहमौषधं मन्रोऽग्निराज्यं च हविर्हुतम् ॥
जो मनुष्य उपासना से हीन है, उसे धिक्कार है और उसका जन्म वृथा है। यज्ञ, औषध, मन्त्र, अग्नि, आज्य, हवि और हुत - सब मेरा ही स्वरूप है।
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