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गणेशगीता • अध्याय 7 • श्लोक 15
आकृष्य चेतसो वृत्तिं ततो न्यासं उपक्रमेत् । कृत्वान्तर्मातृकान्यासं बहिश्चाथ षडङ्गकम् ॥
फिर चित्त की वृत्तियों का निरोध करके न्यास करे। अन्तर्मातृ का न्यास करके फिर बहिर्मातृ का न्यास तथा षडंग न्यास करे।
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