सोऽपि मामेव यजते परं त्वविधितो नृप ।
यो ह्यन्यदेवतां मां च द्विषन्नन्यां समर्चयेत् ॥
हे राजन्! वह भी मेरी ही पूजा करता है, किंतु विधिपूर्वक नहीं, जो अन्य देवता का अथवा मेरा पूजन करके द्वेष करता है,
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