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गणेशगीता • अध्याय 7 • श्लोक 11
साप्युत्तमा मता पूजानिच्छया या कृता मम । ब्रह्मचारी गृहस्थो वा वानप्रस्थो यतिश्च यः ॥
वह भी यदि कामनारहित होकर की जाय तो अति उत्तम है। ब्रह्मचारी, गृहस्थ अथवा वानप्रस्थ या संन्यासी अथवा
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