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गणेशगीता • अध्याय 6 • श्लोक 5
अन्यां मत्प्रकृतिं वृद्धा मुनयः संगिरन्ति च । तथा त्रिविष्टपं व्याप्तं जीवत्वं गतयानया ॥
और भी वृद्ध मुनिजन ऐसा वर्णन करते हैं कि आने-जाने वाली, जीवत्व को प्राप्त हुई तथा त्रिलोकी में व्याप्त भी मेरी दूसरी (परा) प्रकृति है।
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