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गणेशगीता • अध्याय 6 • श्लोक 4
क्वनलौ खमहङ्कारः कं चित्तं धीसमीरणौ । रवीन्दू यागकृच्चैकादशधा प्रकृतिर्मम ॥
पृथ्वी, अग्नि, आकाश, अहंकार, जल, चित्त, बुद्धि, वायु, रवि, चन्द्र, यजमान - यह ग्यारह प्रकार की मेरी (अपरा) प्रकृति है।
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