अनन्यशरणो यो मां भक्त्या भजति भूमिप ।
योगक्षेमौ च तस्याहं सर्वदा प्रतिपादये ॥
हे राजन्! जो अनन्यशरण होकर भक्ति से मेरा भजन करता है, मैं सदा उसके योगक्षेम (मंगल) का विधान करता हूँ।
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