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गणेशगीता • अध्याय 6 • श्लोक 2
तत्तेऽहं शृणु वक्ष्यामि लोकानां हितकाम्यया । अस्ति ज्ञेयं यतो नान्यन्मुक्तेश्च साधनं नृप ॥
हे राजन्! लोगों के ऊपर अनुग्रह की इच्छा से वह तत्त्व मैं तुमसे वर्णन करता हूँ, जिसके जानने से दूसरे मुक्ति के साधन जानने की आवश्यकता नहीं रहती।
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