धीतपोबलिनां चाहं धीस्तपोबलमेव च ।
त्रिविधेषु विकारेषु मदुत्पन्नेष्वहं स्थितः ॥
बुद्धिमान्, तपस्वी एवं बलिष्ठों में बुद्धि, तप और बलरूप से और मुझसे ही उत्पन्न हुए तीन प्रकार के विकारों में मैं ही स्थित हूँ।
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