आत्मज्ञानरतं ज्ञाननाशिताखिलसंशयम् ।
योगास्ताखिलकर्माणं बध्नन्ति भूप तानि न ॥
हे राजन्! जो आत्मज्ञान में रत हैं, जिन्होंने ज्ञान से सभी सन्देह दूर कर लिये हैं तथा योग में स्थित होकर जिनके कर्म क्षीण हो गये हैं, वे बन्धन में नहीं पड़ते।
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