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गणेशगीता • अध्याय 3 • श्लोक 48
भक्तिहीनोऽश्रद्दधानः सर्वत्र संशयी तु यः । तस्य शं नापि विज्ञानमिह लोकोऽथ वा परः ॥
जो भक्तिहीन, श्रद्धारहित और सर्वत्र संदिग्ध चित्तवाला है, उसे कल्याण की प्राप्ति नहीं होती, न ज्ञान होता है तथा उसका इहलोक और परलोक नष्ट हो जाता है।
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