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गणेशगीता • अध्याय 3 • श्लोक 46
न ज्ञानसमतामेति पवित्रमितरन्नृप । आत्मन्येवावगच्छन्ति योगात्कालेन योगिनः ॥
हे राजन्! ज्ञान के समान और कोई वस्तु पवित्र नहीं है, योगसिद्ध महात्मा उस ज्ञान को यथासमय स्वयं ही प्राप्त करते हैं।
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