न ज्ञानसमतामेति पवित्रमितरन्नृप ।
आत्मन्येवावगच्छन्ति योगात्कालेन योगिनः ॥
हे राजन्! ज्ञान के समान और कोई वस्तु पवित्र नहीं है, योगसिद्ध महात्मा उस ज्ञान को यथासमय स्वयं ही प्राप्त करते हैं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
गणेशगीता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
गणेशगीता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।