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गणेशगीता • अध्याय 3 • श्लोक 43
इतरत्सुलभं राजन्सत्संगोऽतीव दुर्लभः । यज्ज्ञात्वा पुनर्वेधमेति ज्ञेयं ततस्ततः ॥
हे राजन्! अन्य सब तो सुलभ है, परंतु सत्संग बड़ा दुर्लभ है। जिसके जानने से फिर संसार के बन्धन में नहीं आना होता, उसे जानना आवश्यक है।
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