सत्संगाद्गुणसंभूतिरापदां लय एव च ।
स्वहितं प्राप्यते सर्वैरिह लोके परत्र च ॥
सत्संग से गुणों की प्राप्ति और आपदा का नाश होता है तथा लोक और परलोक में अपना कल्याण प्राप्त होता है।
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