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गणेशगीता • अध्याय 3 • श्लोक 4
एवं पुरातनं योगं श्रुतवानसि मन्मुखात् । गुह्याद्गुह्यतरं वेदरहस्यं परमं शुभम् ॥
अब फिर तुमने मेरे मुख से इस पुरातन योग को सुना है, यह गुप्त-से-गुप्त, अत्यन्त कल्याणकारक और सम्पूर्ण वेदों का सार है।
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