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गणेशगीता • अध्याय 3 • श्लोक 37
नित्यं ब्रह्म प्रयान्त्येते यज्ञशिष्टामृताशिनः । अयज्ञकारिणो लोको नायमन्यः कुतो भवेत् ॥
अन्य दूसरे नित्य ही यज्ञ से बचे अमृत पदार्थ का भोजन कर नित्य ब्रह्म को प्राप्त होते हैं। यज्ञ न करने वालों को तो यह लोक भी नहीं मिलता, परलोक कहाँ मिलेगा?
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