जित्वा प्राणान्प्राणगतीरुपजुह्वति तेषु च ।
एवं नानायज्ञरता यज्ञध्वंसितपातकाः ॥
दूसरे नियताहार होकर पाँचों प्राणों में पाँचों प्राणों की आहुति देते हैं, इस प्रकार अनेक प्रकार के यज्ञों में निरत योगी यज्ञ द्वारा पापों का नाश, करते हैं।
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