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गणेशगीता • अध्याय 3 • श्लोक 35
प्राणेऽपानं तथा प्राणमपाने प्रक्षिपन्ति ये । रुद्ध्वा गतीश्चोभयस्ते प्राणायामपरायणाः ॥३
जो पूरक से प्राणवायु में अपान का और रेचक से प्राण का अपान में हवन करते हैं और कुम्भक के अनुष्ठान से प्राणापान की गति को रोक लेते हैं, वे प्राणायाम में परायण होते हैं।
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