प्राणानामिन्द्रियाणां च परे कर्माणि कृत्स्नशः ।
निजात्मरतिरूपेऽग्नौ ज्ञानदीप्ते प्रजुह्वति ॥
कोई दूसरे ज्ञान में जलती हुई वैराग्यरूपी अग्नि में सम्पूर्ण इन्द्रिय, कर्म और प्राणों का हवन करते हैं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
गणेशगीता के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
गणेशगीता के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।