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गणेशगीता • अध्याय 3 • श्लोक 31
योगिनः केचिदपरे दिष्टं यज्ञं वदन्ति च । ब्रह्माग्निरेव यज्ञो वै इति केचन मेनिरे ॥
कोई योगी देवयजन को यज्ञ कहते हैं, दूसरे ब्रह्मरूप अग्नि में यज्ञ करने को यज्ञ मानते हैं।
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